जानिये क्या है धारा 377 का इतिहास!!!!

धारा 377 के बारे में तो आपने सुना ही होगा पर क्या आप जानते हैं धारा 377 का इतिहास? यही वो धारा है जिसने कुछ वक़्त पहले एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। वह विवाद आज भी अस्तित्व में है। लोग इसके बारे में जाने या नहीं पर बातें सब खूब करते हैं और 377 के सबसे बड़े पीड़ित, LGBT समुदाय के लोगों को गालियाँ भी देने लगते हैं। जानकारी के आभाव में हम अनाप-शनाप बोलते हैं जिससे किसी का भला नहीं होता। तो क्यों न आज हम जानें कि आख़िर क्या है धारा 377 का इतिहास? चलिये जानते है इसके बारें में, इसके इतिहास से।

धारा 377 का इतिहास, इस धारा का जन्म

सालों पहले, जब महारानी विक्टोरिया ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत का साम्राज्य लिया तब, अंग्रेजों के सामने एक भारी समस्या थी। भारत साम्राज्य में तब कोई एक क़ानून नहीं था। इस समस्या को सुलझाने के लिये इंग्लैंड ने सर थामस बेबिंगटन मैकाले को भेजा गया। सर मैकाले ने तब 511 धारा वाली एक लम्बी संहिता बनाई। आज हम उसी 511 धारा वाली संहिता को भारतीय दंड संहिता (ताज़िरात-ए-हिंद) के नाम से जानते हैं। इस संहिता की कुछ धाराऐं जैसे धारा 302, 307, 498-A, 120-B, 420 बहुत प्रसिद्ध हैं। उस संहिता का नाम भले ही कुछ भी रखा गया हो पर ये संहिता पूरी तरह भारतीय नहीं है न ही कभी थी। भारतीय दंड संहिता की आत्मा में अंग्रेजों का क़ानून था जो इंग्लैंड में जन्मा था। तब भी ये संहिता भारत में ख़ूब काम आई।

जब संहिता लिखी जा रही थी तब इंग्लैंड की राजसत्ता पर चर्च हावी था। सन् 1800 की उस सदी में चर्च का मानना था कि संभोग सिर्फ़ बच्चे पैदा करने के लिये होना चाहिये। इस कारण योनि-मैथुन के अतिरिक्त तमाम संभोग अप्राकृतिक घोषित कर दिये गए। जिस चर्च की रूढ़िवादिता के कारण एक भारतीय महिला गर्भपात न होने देने के कारण 21 सदी में मर जाती है, उस चर्च की सन् 1800 में ताकत का अंदाजा अाप साफ़ लगा सकते हैं। जी हाँ, धारा 377 अप्राकृतिक संभोग के बारे में बताती है और उसके लिये दण्ड भी निर्धारित करती है।

धारा 377 की इंग्लैंड में स्थिति

इंग्लैंड की न्याय व्यवस्था न्यायालयों के निर्णयों पर आधारित है। इंग्लैंड के न्याय लिखित संहिताओं पर बहुत कम निर्भर है। साथ ही वहाँ का लिखित न्याय साहित्य भारतीय न्याय साहित्य की तरह विशाल नहीं है। इंग्लैंड में इसी कारण कोई धारा 377 नहीं है। इंग्लैंड के UN Declaration पर हस्ताक्षर करने के बाद वहाँ पर LGBT समुदाय के लोगों के अधिकारों की रक्षा करने की पहल ख़ुद वहीं की सरकार ने की है। यहाँ तक की इंग्लैंड ने Gender Recognition Act,  2004 भी पारित की है जो LGBT समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ किये किसी भी कृत्य के लिये दण्ड निर्धारित करती है। अफ्सोस, भारत में LGBT समुदाय की स्थिति बहुत हद तक बिगड़ चुकी है।

जहाँ धारा 377 के जन्मदाता इंग्लैंड ने इसे कभी अपना क़ानून नहीं बनाया, वहीं भारत में इस क़ानून की आड़ में LGBT समुदाय के लोगों की बलात्कार और हत्या की जा रही है। हमारे देश में जीवन का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को मिला है पर धारा 377 LGBT समुदाय से जीवन का अधिकार ही छीन ले रहा है। समय वाक़ई बहुत बड़ी माँग कर रहा है। परिवर्तन आज नहीं तो कल होना ही है। सारे रूढ़िवादी ख़त्म होंगे और LGBT समुदाय को जीवन का अधिकार मिलेगा। ये हमारे ऊपर है कि हम इसके लिये उनका कितना ख़ून बहने देते हैं।

श्री शशि थरूर जी की धारा 377 को ख़त्म करने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करें

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