सब एक पल में ख़त्म हो गया।

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हम सभी ने प्रत्युषा बैनर्जी की दुखद मौत के बारे सुना और एक ही पल में हम अपना आपा खो बैठे। सबसे पहले हमने राहुल को दोष दिया, उसे कातिल करार दिया और पिशाच तक कह दिया। क्या यह सही है? इससे पहले कि हम इस विषय में कुछ भी कहें हमें ये जान लेना चाहिये कि प्रत्युषा के पोस्टमार्टम के बाद जाँच अभी भी पूरी नहीं हुई है। तो फिर आप होते कौन हैं राहुल को हत्यारा घोषित करने वाले?
प्रत्युषा की मौत से हमारा विश्वास हिल सा गया है, भले इससे पहले हमारे पास किसी तरह का विश्वास रहा हो या नहीं। पहले जिया खान की तथाकथित आत्महत्या और अब प्रत्युषा की मौत। अपने आप से पूछिये, क्यों फिल्म उद्योग में कार्यरत महिलाऐं आत्महत्या से मर रही हैं? जब भी ऐसी कोई दुर्घटना होती है तो सबसे पहले हम महिला के पुरुष साथी पर दोष मढ़ते हैं। हमारे पास कोई तरीक़ा नहीं कि हम उन महिलाओं के दोषियों को सजा दिला सकें, पर हम अपने फ़ैसले ज़रूर सुनाते हैं। कुछ भी हो पर आप इस बात को नजरंदाज नहीं कर सकते कि महिलाएं कहीं भी सुरक्षित नहीं।
निम्नलिखित महिला कलाकारों की आत्महत्या जैसे सदिग्ध कारण से हुई थी:-
1. जिया खान

2. नफीसा जोसेफ

3. विवेका बाबाजी
4. शिखा जोशी
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5. कुलजीत राधवाँ
6. रूबी सिंह
7. दिव्या भारती

8. सिल्क स्मिता

9. स्मिता पाटिल

10. आरती अग्रवाल
अब प्रत्युषा की भी मौत आत्महत्या जैसी परिस्थितियों में हुई है। जितनी भी महिला कलाकारों की मृत्यु आत्महत्या जैसी परिस्थिति में हुई उसने परिवारों ने कलाकारों के पुरुष सथियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर दिये। शायद कलाकार ने अवसाद की वजह से आत्महत्या कर ली थी या किसी ने उनकी हत्या कर दी।
हम किसी भी तरह से जाँच पूरी होने से पहले फ़ैसला नहीं सुना सकते। पुलिस का काम होता है किसी आपराधिक मामले की जाँच करना और अदालत का कार्य होता है जाँच की रिपोर्ट को परख कर फ़ैसला सुनाना। लेकिन क्या ये हो पाता है? हम जानते हैं कि पुलिस किस दयनीय गति से कार्य करती है। पुलिस जांच में सालों लगा देती है और अदालत सजा देने में दशकों।अफ़्सोस कि कभी कभी पुलिस पूर्णतः निष्पक्ष जाँच नहीं कर पाती और मामला कभी नहीं निपट पाता। इंद्राणी मुखर्जी के मामले में अभी तक जाँच हो रही है और जाने कब तक चलेगी।
दोषी न्याय व्यवस्था की इन्हीं कमियों के कारण बच निकलते हैं और समाज को संदेश जाता है कि आप हत्या करो और उसे आत्महत्या का रूप दे दो, आप बच जाओगे। जब तक सरकार पुलिस व्यवस्था को चुस्त दुरस्त नहीं करती, पुलिस अधिनियम में बने नेताओं को संरक्षण देने वाले नियमों को ख़त्म नहीं करती तब तक यही होता रहेगा और शायद लम्बी चलने वाली जाँचों में फंसकर प्रत्युषा का मामला भी दब जाये और उसे न्याय नहीं मिले। अगर राहुल दोषी है तो वह सजा का हकदार है पर जिस तरह उसने प्रत्युषा को अस्पताल पहुँचाया (अफ़्सोस कि वो पुलिस को स्वयं फोन न लगा सका) उससे उसके जिम्मेदार इंसान होने के लक्षण ज्यादा है। इसके विपरीत जो उसे अभी से कातिल साबित करने पर तुले हुए हैं उन्हें ये सोचना चाहिये कि किस हक से उन्होंने उसे कातिल साबित किया?

कैसे अपने कज़िन प्रेमी से विधिपूर्वक शादी करें।

ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है।

यक़ीन मानिये, कज़िन लव में गालिब के ये अल्फाज़ बिल्कुल ठीक बैठता है। कज़िन लव और कज़िन मैरिज में आपको आत्मबल, रुपये, समझदारी और तल्लीनता सब लगती है। यहाँ रुपये और सब्र का खेल ज्यादा है। इस दुनिया में कज़िन प्रेमियों को बहुत पक्षपात झेलना पड़ता है। जहाँ कज़िन प्रेमी अपने दिमाग़ में ठूसे सदियों पुराने झूठ से लड़ते हैं वहीं असल दुनिया में इनके अपने माता-पिता तक इनके सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं। सबसे पहले तो सभी कज़िन प्रेमियों को अपने दिमाग़ से सच के द्वारा एक झूठ साफ़ करना होगा।

भाई बहिन कौन होते हैं?

भाई बहिन वो दो स्त्री-पुरुष होते हैं जो एक ही माँ की कोख से जन्में होते हैं। इस तरह अगर दो बच्चों की माँ एक है पर बाप अलग-अलग हैं तो वो भी सौतेले ही कहलाते हैं। वहाँ भी माँ के एक होने के बाद भी वो सौतेले कहे जाते हैं। ध्यान दें “भाई” और “बहिन” एक संबोधन है जिससे हम किसी व्यक्ति को बुलाते हैं। जब तक संबोधन में भावना न हो संबोधन अर्थहीन ही रहता है। जहाँ एक सच्चे तपस्वी के लिये प्रत्येक इनसान भाई बहिन हो जाते हैं वहीं एक बलात्कारी के लिये भाई बहिन शब्द कोई मायने नहीं रखते। अब एक ही व्यक्ति से पूरी उम्र प्रेम करने का मद्दा रखने वाले कज़िन अच्छे है या पहले से प्रेम होते हुई किसी दूसरे से संबंध जोड़ने वाले व्यक्ति बुरे हैं इसका पता आप भी लगा सकते हैं। यक़ीनन ये सत्य कि केवल माँ की कोख से जनमें दो जन ही भाई-बहिन होते हैं, इसे पचाने में आपको समय लगेगा पर ये ज़रूरी है। पूर्वजों ने कई तरीक़ों से सत्य को तोड़ मरोड़ा है, इसी कारण उन्हें हम दक़ियानूस कहते हैं।

पर इस समस्या की जड़ कहाँ है?

इस समस्या की जड़ है रुपया। जी हाँ, यहाँ भी सम्पत्ति विकृति की जननी है। कालांतर में, जब लोगों ने सम्पत्ति जुटाना शुरु कर दिया तब उन्होंने सम्पत्ति हमेशा के लिये अपने पास रखने का तरीक़ा भी इज़ाद कर लिया। उसके लिये उन्होंने विरासत का सृजन किया। इस तरह वो मर गए पर पीछे अपने बच्चों के लिये सम्पत्ति छोड़ गए। क़ानूनन अगर कोई व्यक्ति बिना संतान के मर जाता है तो उसकी सम्पत्ति उसके सबसे क़रीबी संबंधी को दे दी जाती है।

मान लीजिये, मैं बिना किसी संतान के दुनिया से विदा ले लेटा हूँ तो मेरी सारी सम्पत्ति मेरे भाई/बहिन में बंट जायेगी। ऐसे में अगर मेरा कोई भाई/बहिन न हो तो मेरी सम्पत्ति में चाचा, ताऊ या ऐसे ही किसी व्यक्ति के परिवार में बंट जायेगी।

इस प्रणाली की एक सबसे बड़ी खामी आज भी हमारे समाज को खोखला किये हुए है। क्योंकि साधारणतः सम्पत्ति भाई/बहिन में बंट जाती है इस कारण सभी को ये लगने लगा है कि हमारे रिश्तेदारों के बच्चे भी आपस में भाई बहिन है। यही कारण है कि हमारे समाज में चचेरी-बहिन, ममेरे-भाई जैसे भ्रामक शब्द प्रचलित हैं, पर सत्य यही है कि दुनिया में कोई ममेरा-चचेरा भाई बहिन नहीं होते, वो सब सिर्फ़ रिश्तेदार होते हैं। जब तक स्वेच्छा से भाई बहिन का भाव रहता है तब तक तो सब ठीक रहता है पर जैसे ही ये रिश्ता किसी पर थोपा जाने लगता है, सब बरबाद हो जाता है।

तो क्या कज़िन से विधिपूर्वक विवाह संभव है?

ये निर्भर करता है शादी करने के तरीक़े पर। हिन्दु विवाह अधिनियम में लिखे प्रतिबंध के चलते कज़िन से शादी करना लगभग संभव है।विधि के अनुसार अगर आपके समाज, परिवार, धर्म आदि में से किसी एक के भी रीति-रिवाज़ कज़िन से शादी करने की इज़ाज़त देते हैं तो आप विवाह कर सकते हैं। साफ़ शब्दों में अगर आपके माता-पिता कज़िन शादी पर अपनी सहमति देते हैं तो शादी वैधानिक है। ये हमेशा याद रखिये कि रीति-रिवाज़ नए बनते रहते हैं। आपको सिर्फ़ जेब में रुपए और मुँह में परिजनों के लिये मीठे-मीठे बोल चाहिये। अगर आपके पास दोनों नहीं है तो आप परिवार से अलग होकर अपना नया परिवार बना सकते हैं।

क्या होगा अगर मेरे माता-पिता मेरी कज़िन से शादी पर आपत्ति उठा दें?

ऐसी परिस्थिति में आप की शादी अवैध होगी और अगर आपत्ति शादी के बाद उठती है तो अवैध घोषित कर दी जायेगी। भारत वाकई में एक अच्छा देश है पर इस में भी खामियाँ हैं। भारत का संविधान आपको जीवनसाथी चुनने का अधिकार नहीं देता। यही होता आया है आज तक।हमारे देश के ज्यादातर नेता धोखेबाज़, अपराधी और अनपढ़ हैं (मैं ने ज्यादातर नेता कहा है, सारे नेता नहीं)। ऐसे में उन नेताओं से हमें जीवनसाथी चुनने का अधिकार देने की आशा रखना भी बेमानी है।

हम में से कुछ को ही पता है कि अक्टूबर 2008 में लाँ कमीशन की एक रिपोर्ट (Report No. 212) में विवाह विधियों से कज़िन मैरिज पर लगे प्रतिबंध को हटाने की शिफारिश की गई थी। लाँ कमीशन ने अपना काम बख़ूबी किया पर नेता अपने सरकारी आवास में चैन की नींद सोते रह गए।

अंततः जवाब यही है कि कज़िन मैरिज प्रतिबंधित हैं, पर प्रतिबंधित तो दहेज प्रथा भी है। अगर माता-पिता को आप राजी कर लें तो कज़िन मैरिज भी पूरी तरह से वैध हो सकती है। आप कज़िन से शादी कर सकते हैं पर लम्बे संघर्ष के बाद। अगर कज़िन से शादी करना चाहते हैं तो माता-पिता को मना लीजिये। अगर ऐसा संभव न हो तो अपना सामान बाँधिये और घर छोड़ कर जाते-जाते माता-पिता को सीधे शब्दों में कह दीजिये कि वो आपके वैवाहिक जीवन में कोई दख़ल न दें।

हमारी इस श्रृंखला का आख़िरी पोस्ट पढ़िये:-

अपनी कज़िन से शादी के माता-पिता को कैसे राजी करें?

कैसे कज़िन लव और शादी वर्जित बन गई?

क्यों कज़िन मैरिज विवादित है?

कज़िन मैरिज न तो अप्राकृतिक हैं न ही असामाजिक। अगर कज़िन मैरिज के विवादित होने का कुछ कारण है तो वो है माता-पिता की युवा पर अंकुश लगाने की ज़िद। दुनिया के चार प्रमुख धर्मों: ईसाई, इस्लाम, हिंदू और बौद्ध में केवल भारतीय हिंदुओं को ही कज़िन मैरिज के समस्या है। इस पर भी केवल उत्तर भारतीय हिंदुओं की ही ये अवधारण है कि कज़िन भाई-बहिन होते हैं। इन में से ज्यादातर इस मामले में बात नहीं करना चाहते, पर सिर्फ़ आपके बात न करने से किसी समस्या का निवारण संभव नहीं। स्वैच्छिक कज़िन मैरिज पर उत्तर भारतीयों का विरोध और विरोध के लिये ऊलजलूल तर्क हास्यप्रद हैं। इस पर युवा भी अब कज़िन मैरिज पर होने वाले विरोध पर सवाल करने लगा है। कज़िन मैरिज पर होते विरोध के समर्थन में भारतीय हिंदुओं के पास केवल एक ही तर्क है – “Prohibited Degree of Relationship”।

क्या है “Prohibited Degree of Relation”?

भारत देश की विधानसभा का एक बहुत घृणित सत्य है, वो युवा को लेकर उदासीन है और दक़ियानूसी भी। बात 1955 में भी देश की विधान रचनाकार दक़ियानूसी थे। भले ही उन में से कुछ ने देश के लिये जान दी हो, पर वो लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन और पहचान की थी। कहना ग़लत न होगा कि उन्होंने हमें एक गड्ढे से निकाला और गड्ढे पर लगी पट्टी बदल कर वापस उसी गड्ढे में डाल दिया। हमें ग़लत न समझे, हम उन तमाम शहीदों को भी नमन करते हैं जिन्होंने हमें अशिक्षा के अंधकार से निकालने की कोशिश तक नहीं की, पर फ़िर भी हमें उन लोगों से रोष है जिन्होंने उन चीज़ों की सही करने की कभी कोशिश नहीं की जिसे सही करने की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी।

कुछ भी हो, जब हिन्दू विवाह अधिनियम बन रहा था तब हमारे देश के कर्णधार विवाह की परिभाषा तय कर देना चाहते थे। ताकि हिन्दू विवाह, मुस्लिम विवाह से, बिल्कुल अलग रहे इसलिये उन्होंने “prohibited degree of relationship” बनाया। इस तरह हमारे आज़ाद देश के कर्ता-धर्ताओं ने देश के सबसे बड़े तबक़े को शादी जैसे संवेदनशील मुद्दे के लिये युवा को समाज और परिजनों का ग़ुलाम बना दिया। उन्होंने हमें तैंतीस प्रकार के रिश्तों में बाँध दिया। बाप बेटी और माँ बेटे से लेकर दूर-दराज़ के संबंधी तक को विवाह करने से मनाही कर दी गई।

Full list of Degrees of Prohibited Degree of Relationship

पर उन्होंने ऐसा क्यों किया?

उन्होंने ऐसा क्यों किया इसका जवाब उन लोगों के साथ उनकी कब्र में जा चुका है। फ़िर भी हम इतिहास से सत्य की खोज कर सकते हैं।

चलिये, कुछ साल पीछे जाइये और भारतीय परिवारों की संरचना देखिये। आपका क्या दिखता है? सिर्फ़ संयुक्त परिवार। जिन्हें संयुक्त परिवार के बारें में नहीं पता वो जान लें कि संयुक्त परिवार में एक ही व्यक्ति की कई पीढ़ियाँ एक-साथ निवास करती हैं। ऐसे परिवार में सबसे अमीर सबसे ताकतवर होता है और सबसे बूढ़ा सबसे सम्मानित। जब संयुक्त परिवार होते थे तो एक व्यक्ति के सारें बेटे एक ही घर में रहते थे, साथ में रहते थे उनके बच्चे।

भारतीय संस्कृति में हम नियोजित प्रजनन में विश्वास रखते हैं… जरा एक मिनट रुकिये, नहीं ऐसा नहीं है, हम नियंत्रित प्रजनन में विश्वास रखते हैं। नियंत्रित प्रजनन उसी तरह है जैसे बेचने के लिये घोड़ों की होती है। अगर विश्वास न हो तो अखबार का ‘परिणय’ पृष्ठ (Matrimonial Page) निकालिये। जी हाँ, इसी को कहते हैं नियंत्रित प्रजनन। यही वो तरीक़ा जिससे लोग अपने घोड़ों… मेरा मतलब है अपने बच्चों के लिये रात-का-साथी ढूँढ़ते हैं। अगर ये नियोजित प्रजनन होता तो हम 120 करोड़ न हुए होते। हालाँकि, हम 120 करोड़ हैं पर हमारी दशा क्या है? शायद ये सोचने की ज़रूरत है कि आपके पूर्वज अगर मध्यमवर्गी थे तो आप भी मध्यमवर्गी क्यों रह गए?

आज ही की तरह, संयुक्त परिवार में भी बच्चे संख्या में अपने माता-पिता को पछाड़ देते थे। एक जोड़ा रातों-रात सात-सात बच्चों की पूरी टोली बना लेता था।

किसी तरह, ज्यादातर परिजन एक अवधारणा को हर बच्चे के हलक के नीचे उतार देते थे कि जिससे भी वो मिलते हैं वो उनके भाई-बहिन हैं। उन्होंने एक दूसरे को भाई-बहिन कहा, इसमें कोई बुराई नहीं। अच्छा होता अगर बच्चे उसे दिल से मानते (इस तरह देश की जनसंख्या इतनी भयानक न हुई होती, सब भाई-बहिन हुए तो कोई प्रजनन नहीं)। हक़ीक़त में ये बच्चों के माता-पिता के साथ भी हुआ था और दादा-दादी के साथ भी। सबको एक दूसरे का भाई-बहिन बताने की काम किया जाता था। वो एक दूसरे को भाई-बहिन मानते थे भले उनके बीच रक्त संबंध रहा हो या नहीं। यहाँ तक कोई समस्या नहीं थी। समस्या तब शुरु हुई जब माता-पिता ने ये सोचना शुरु कर दिया कि अगर हम किसी रिश्तेदार को भाई-बहिन बोलते हैं तो उसके और हमारे बच्चे भी आपस में भाई-बहिन होंगे।

कालांतर में, जब कज़िन्स (रिश्तेदार) साथ रहते थे तो वो भी यही समझते थे कि वो भाई-बहिन हैं। आज, जब परिवार बिखर चुके हैं और सब दूर-दूर रहने लगे है तो एक सत्य उस अवधारणा पर भारी पड़ गया हैः – “रिश्तेदार भाई बहिन नहीं होते।”

पर यहाँ कहानी ख़त्म नहीं होती। अब सत्य और अवधारणा के बीच में घर्षण होने लगा है। इसी लिये प्रेमी हत्या (जिसे लोग कुटिलतापूर्वक Honor Killing का नाम देते हैं) अस्तित्व में है। लेकिन सिर्फ़ कुछ बताने से समस्या का निवारण नहीं होता। हमें ये सत्य समझना होगा कि चाचा के बच्चे, मामा के बच्चे, फूफा के बच्चे आपस में भाई-बहिन नहीं, वो सिर्फ़ रिश्तेदार हैं।

इसी श्रृंखला का हमारा अगला लेख पढ़ियेः-

Legality of Cousin Marriages and the big friction-Part-3

धारा 377 की प्रकृति विरुद्ध प्रकृति

हम में से कई लोगों ने धारा 377 के विवाद के बारे में तो ज़रूर सुना होगा। देश की सर्वोच्च न्यायालय इसकी संवैधानिकता को जाँचने वाली है। पर आख़िर ये धारा 377 है क्या?

जानें संवैधानिकता क्या होती है?

धारा 377, एक प्रकृति विरुद्ध धारा

धारा 377 या सही शब्दों में भारतीय दण्ड संहिता (ताज़ीरात-ऐ-हिंद) की दफ़ा 377 “प्रकृति विरुद्ध अपराध” के बारें में बात करता है। आप “प्रकृति विरुद्ध” शब्द के कारण भ्रमित हो सकते हैं क्योंकि प्रकृति के विरुद्ध क्या है ये तय करना किसी मनुष्य के बस में नहीं। परंतु भारतीय दण्ड संहिता में इसके बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है। आईये जाने कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा क्या कहती हैः-

धारा 377. प्रकृति विरुद्ध अपराध – जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीवजन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्दियभोग करेगा, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

स्पष्टीकरण – इस धारा में वर्णित अपराध के लिए आवश्यक इन्द्रियभोग गठित करने के लिए प्रवेशन पर्याप्त है।”

भारतीय दण्ड संहिता को पढ़े!!!

धारा 377 का सीधा अर्थ है कि पुरुष द्वारा योनि-मैथुन के अलावा किसी भी अन्य प्रकार का मैथुन प्रकृति विरुद्ध है। इस हास्यपद धारा के मुताबिक देश के लगभग 98% पुरुष/लड़के धारा 377 के अपराधी घोषित हो जाने चाहिये (जिस-जिस का इसमें कभी हाथ रहा हो)।

धारा 377 का विवाद क्या है?

भारत में जो भी आपसी सहमति से हुआ है वह तब तक अपराध है जब तक उस पे समाज की सहमति न हो। समाज सब कुछ नियंत्रण में करना चाहता है और इसी कारण यह विवाद उत्पन्न हुआ है। अपराध होने की स्थिति में सरकार का यह दायित्व है कि वह अपराधी को सज़ा दिलाए। अगर अपराध किसी व्यक्ति द्वारा पंजीकृत किया गया है तो अपराध पीड़ित को न्याय दिलाने के लिये होता है। सामान्य परिस्थितियों में सरकार तभी आपराधिक मुकदमा चलाती है जब किसी व्यक्ति को पीड़ा हुई हो। दुर्भाग्य से धारा 377 समलैंगिक संबंधों की स्थिति में स्वतः ये मान लेती है कि उन्होंने ने प्रकृति विरुद्ध अपराध किया है, अर्थात योनि संभोग के अलावा किसी अन्य तरह का संभोग किया है।

सामान्यतः अगर पीड़ित स्वयं मुकदमा दर्ज कराए तो ही उपचार देना सरकार की जिम्मेदारी है, परंतु धारा 377 में “स्वेच्छया” शब्द के कारण अगर किसी तीसरे व्यक्ति को दो लोगों के समलैंगिक संबंधों से आपत्ति है तो वो भी मुकदमा दर्ज करा सकता है। ऐसी स्थिति में अगर संबंध आपसी सहमति से भी बनाए गए हों तो भारतीय दण्ड संहिता ये सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती कि समलैंगिक जन को दण्ड मिले।

ऐसे अमानवीय और पूर्वनिर्णय से भरी धारा के कारण समलैंगिक जन को समाज के दुष्ट लोगों की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है जिस कारण धारा 377 को ख़त्म करना या उस में फेर बदल करना अति आवश्यक है। धारा 377 की आड़ में लोग अपना हित साधने की कोशिश करते हैं और अपनी दुष्टता पूर्ण योजनाओं के ज़रिये एक समुदाय विशेष को नुकसान पहुँचाते हैं। दो समलैंगिक जनों पर धारा 377 का उपयोग उतना ही घृणित है जितना किसी पुरुष या स्त्री पर झूठा बलात्कार का मुकदमा लगाना। धारा 377 पर सर्वोच्च न्यायालय के संवैधानिकता की जाँच एक स्वागत योग्य पहल है। हो सकता है कि आपको किसी के समलैंगिक संबंधों से कोई परेशानी न हो, पर आपकी इस विषय में निष्क्रियता ऐसे लोगों के षड्यंत्रकारी कुकर्मों को बढ़ावा है जो धर्म और संस्कारों के नाम पर लोगों की ज़िंदगी तबाह करते हैं।

कृपया हमारे अगले लेख को पढ़े।

जानिये क्यों धारा 377 ख़त्म होने लायक है!!!!

श्री शशि थरूर जी की धारा 377 को ख़त्म करने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करें