अपने परिजनों को कज़िन प्रेम विवाह के लिये कैसे मनाऐ?

हो सकता है कि ये एक कड़वा सत्य हो, पर हाँ, एक सुखी कज़िन प्रेम विवाह के लिये आपको अपने माता-पिता को मनाना होगा। अगर ये आपके लिये संभव न हो तो भी आपके पास कई रास्ते हैं।

एक पुरानी कहावत है:-

जो आपको मार नहीं पाता, वो आपको ताकतवर बना देता है।

लोग शादी करने के लिये मरे जा रहे हैं। अफ़्सोस, प्रेमियों के साथ भी ऐसा ही है। लेकिन जो आम मानसिकता से परे जा चुके हैं उन्हें शादी के होने-न-होने की कोई परवाह नहीं। अगर आप अपने कज़िन से शादी करने के लिये मरे जा रहे हैं तो हो सकता है कि एक दिन आपकी जान चली भी जाये। आपको कभी भी शादी जैसी तुच्छ चीज के लिये नहीं मरना चाहिये।

सबसे पहले, इससे पहले कि आप अपने माता-पिता को कज़िन प्रेम विवाह के लिये मनाने जाएं, आपको ख़ुद इस बात को समझना होगा कि कज़िन आपका भाई/बहिन नहीं है। साथ ही आपको ये बात अपने माता-पिता को समझाने की हिम्मत भी दिखानी होगी। इस पर अगर वो आपका हुक्का-पानी बंद करने की धमकी दें तो कह देना कि तुम्हें फिक्र नहीं। लेकिन ऐसा करने के लिये आपको आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करनी होगी। साथ ही ये तभी होगा जब आप शादी जैसे कर्म-कांड से ऊपर उठ चुके हो, यक़ीन मानो इससे आप ख़ुद को मजबूत महसूस करोगे।

कज़िन विवाह की वैधानिकता का मुद्दा सिर्फ़ हिंदू, जैन, बौद्ध और सिख समुदाय के लोगों के साथ है (शादी-विवाह के मद्दे क़ानूनन जैन, बौद्ध और सिख भी हिंदू है)। दुनिया के प्रमुख चार समुदाय में से सिर्फ़ हिंदुओं में ही ये समस्या है और इस पर भी ये समस्या ज्यादातर सिर्फ़ उत्तरी भारतीयों के साथ है। हालाँकि, जहाँ समस्या है वहाँ निदान है।

सत्य ही निदान है

जी, हाँ। हालाँकि कज़िन शादियां प्रतिबंधित हैं पर इसका सीधा-साधा मतलब है कि आप मैरिज़ रजिस्ट्रार के पास से शादी का प्रमाणपत्र नहीं ले सकते (ऐसा विदेशी मैरिज़ रजिस्ट्रार के साथ नहीं है)। आप जब तक चाहें तब तक अपने कज़िन के साथ उसकी मर्जी पर रह सकते हैं। आप बच्चे पैदा करिये, अपना परिवार बनाइये, घर बनाइये। छोटे शब्दों में, शादी की कोई ज़रूरत नहीं अगर आपके पास पर्याप्त पैसा, प्यार और खुला दिमाग है। लेकिन अगर आप बिना ब्याह गुज़ारे में विश्वास नहीं रखते तो हमारे पास एक और अचूक समाधान है।

कज़िन प्रेम विवाह पर अपने परिजनों को भी बुलाइये

लीजिये, अब आप जान गए कि आपको क्या करना है। पर ये हिम्मती लोगों के लिये है। भींगी बिल्लियाँ वापस जाएं, प्यार-मुहब्बत को चार गालियां दें और एक कोने में बैठ कर दुनिया के अंत का इंतिज़ार करें।

अपने परिजनों को शादी में बुलाने का मतलब है कि आप उन्हें रजिस्ट्री पोस्ट के ज़रिये शादी का निमंत्रण पत्र भेजे। रजिस्ट्री पोस्ट की रसीद इस बात का प्रमाण होगी कि आपके माता-पिता ने आपकी शादी को मूक सहमति दे दी है।

प्यार की राह पर आगे बढ़ने से पहले आपके पास अच्छा पेशा, जेब में रुपये, बैंक में मुद्रा (नई शुरुवात के लिये), हिम्मत जो अंत तक ख़त्म न हो और ऐसा प्यार चाहिये जो प्यार की हर कसौटी पर खरा उतरा हो। अगर आपकी/आपका प्रेमी अपने पैरों पर न खड़ी/खड़ा हो तो उसकी मदद कीजिये। प्यार की राह में कई इम्तिहान होते हैं और इन्हीं इम्तिहानों से आपको प्यार की सच्चाई का पता लगा सकते हैं।

Know How to test if your lover loves you most!!!

सत्यता में प्रेम में आपके साथी से ज्यादा आपका समर्पण मायने रखता है। साथी कुछ भी हो पर उसे फ़िर भी प्रेम करते रहेंगे। मेरी सलाह, अगर आपके साथी ने आपसे वाकई में प्रेम किया हो तब आप उसका साथ अपने जीवन के अंत तक न छोड़ियेगा। पर अगर आप नहीं जान पाये कि अगर आपकी पसंद ने आपको पसंद किया है तो उससे एक बार ज़रूर पूछ लीजिये।

इस जहान का सबसे कठिन कार्य है अच्छे रुपये कमाना। आज के दौर में तो ये और भी कठिन हो गया है। जब आपकी/आपका साथी ख़ुद को पैरों पर खड़ी/खड़ा करे तब तक आपका भी ऐसा ही करने का फर्ज़ बनता है। अगर आप पहले से रुपये कमा रहे हो तो अपने प्रेम को भी रुपये कमाने में मदद कीजिये, उसे आर्थिक स्वतंत्रता दीजिये, यही तो प्रेमी करते हैं। याद रखिये, अगर आपके परिजन आप पर किसी भी प्रकार का शारीरिक क्षति पहुंचाने के मद्दे से आक्रमण करते हैं तो आप तुरंत अपने प्रेमी/प्रेमिका के साथ जा सकते हैं।

P.S. Anyone reading this post must read LAWFUL SAFETY GUIDE FOR ELOPING LOVERS

याद रखें, सुरक्षा ही रक्षा है।

जब भी हमने प्रेम को परखा एक ही बात को जाना:-

“प्यार कोई कर्म या ओहदा नहीं, प्यार ही ज़िंदगी है और ज़िंदगी बहुत कठिन है।”

आप यक़ीनन अपने कज़िन के साथ रह सकते हैं पर इसके साथ ही आपको क़ानूनी मुक़दमे के लिये तैयार रहना होगा। आज के समय में परिजनों के सींग उग आए हैं। अगर आप ने किसी की बेटी से प्यार करने की हिम्मत की है तो उसके परिजन आपको झूठे बलात्कार के मुक़दमे में फँसाने से भी नहीं चूकेंगे। पर जहाँ समस्या है, वहाँ निदान है।

हालाँकि हमारा संविधान हमें हमारा जीवनसाथी चुनने का अधिकार नहीं देता पर वो हमें किसी के साथ, उसके मर्जी पर, रहने से भी नहीं रोकता। अगर कोई आपको किसी के साथ रहने से रोकता हो तो आप उस पर संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत मुकदमा कर दें और कोर्ट को यह सूचित करें कि आप अपने माता-पिता के साथ और नहीं रहना चाहते/चाहतीं।

लेखक की सभी कज़िन प्रेमियों के लिये सलाह

अगर आप महिला हैं और अपने कज़िन से प्रेम करती हैं तो आपको इस बात के लिये संतुष्ट हो जाना चाहिये कि –

  • आप आर्थिक रुप से स्वतंत्र हैं। किसी भी और चीज से पहले इसे करें।
  • आप किसी भी परिस्थिति का सामना की हिम्मत रखती हैं।
  • आपने अपने प्रेमी के प्रेम को अच्छे से  परखा है। याद रहे, लोग उन्हीं को धोखा देते हैं जो उन पर यक़ीन करें। कभी भी असावधान न रहें।
  • आप किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिये शारीरिक और मानसिक रुप से सक्षम हैं। दुनिया में लोग कमजोर लोगों को ढूँढ़ रहे हैं जिन्हें वो वेश्यावृत्ति के दलदल से ढकेल सके या आतंकवाद फैलाने के लिये आत्मघाती हमलावर बना सकें। जिसे आप अच्छे से न जानते हो उस पर विश्वास न करें। अपने साथ हमेशा एक चाकू या पेपरवेट-दुपट्टा रखे। आप कहीं से भी पत्थर भी पा सकती हैं। याद रखिये हमलावर भी इनसान है और चोट उसे भी लगती है। साथ ही आप अपनी आत्मरक्षा में किसी की हत्या भी कर सकती हैं।

Read: – You have right to protect yourself

  • हमेशा एक अच्छे वकील को संपर्क में रखें। अगर आप अपने प्रेमी के साथ जाने का सोच रहीं है तो आपको भविष्य में याचिका दायर करनी पड़ सकती है।
  • दुनिया में अपने जैसे प्रेमियों के संपर्क में रहें। हो सके तो अपने आस-पास में मौजूद प्रेमियों के संपर्क में रहें। तकनीक के दौर में ये करना ज्यादा मुश्किल नहीं है, है क्या?
  • आपको आपकी सुरक्षा के लिये जो भी उपाय दिमाग़ में आए उसे तुरंत अपनाएं। याद रखें, आपके शत्रु आपकी लापरवाही की ही ताक में हैं। जहाँ आपके ख़ुद के परिजन आपके शत्रु बन बैठे हों वहाँ वो आपको ज्यादा हानि पहुँचा सकते हैं।

सुरक्षित रहें, क़ानून को माने और प्रेम करते रहें!!!

कैसे कज़िन लव और शादी वर्जित बन गई?

क्यों कज़िन मैरिज विवादित है?

कज़िन मैरिज न तो अप्राकृतिक हैं न ही असामाजिक। अगर कज़िन मैरिज के विवादित होने का कुछ कारण है तो वो है माता-पिता की युवा पर अंकुश लगाने की ज़िद। दुनिया के चार प्रमुख धर्मों: ईसाई, इस्लाम, हिंदू और बौद्ध में केवल भारतीय हिंदुओं को ही कज़िन मैरिज के समस्या है। इस पर भी केवल उत्तर भारतीय हिंदुओं की ही ये अवधारण है कि कज़िन भाई-बहिन होते हैं। इन में से ज्यादातर इस मामले में बात नहीं करना चाहते, पर सिर्फ़ आपके बात न करने से किसी समस्या का निवारण संभव नहीं। स्वैच्छिक कज़िन मैरिज पर उत्तर भारतीयों का विरोध और विरोध के लिये ऊलजलूल तर्क हास्यप्रद हैं। इस पर युवा भी अब कज़िन मैरिज पर होने वाले विरोध पर सवाल करने लगा है। कज़िन मैरिज पर होते विरोध के समर्थन में भारतीय हिंदुओं के पास केवल एक ही तर्क है – “Prohibited Degree of Relationship”।

क्या है “Prohibited Degree of Relation”?

भारत देश की विधानसभा का एक बहुत घृणित सत्य है, वो युवा को लेकर उदासीन है और दक़ियानूसी भी। बात 1955 में भी देश की विधान रचनाकार दक़ियानूसी थे। भले ही उन में से कुछ ने देश के लिये जान दी हो, पर वो लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन और पहचान की थी। कहना ग़लत न होगा कि उन्होंने हमें एक गड्ढे से निकाला और गड्ढे पर लगी पट्टी बदल कर वापस उसी गड्ढे में डाल दिया। हमें ग़लत न समझे, हम उन तमाम शहीदों को भी नमन करते हैं जिन्होंने हमें अशिक्षा के अंधकार से निकालने की कोशिश तक नहीं की, पर फ़िर भी हमें उन लोगों से रोष है जिन्होंने उन चीज़ों की सही करने की कभी कोशिश नहीं की जिसे सही करने की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी।

कुछ भी हो, जब हिन्दू विवाह अधिनियम बन रहा था तब हमारे देश के कर्णधार विवाह की परिभाषा तय कर देना चाहते थे। ताकि हिन्दू विवाह, मुस्लिम विवाह से, बिल्कुल अलग रहे इसलिये उन्होंने “prohibited degree of relationship” बनाया। इस तरह हमारे आज़ाद देश के कर्ता-धर्ताओं ने देश के सबसे बड़े तबक़े को शादी जैसे संवेदनशील मुद्दे के लिये युवा को समाज और परिजनों का ग़ुलाम बना दिया। उन्होंने हमें तैंतीस प्रकार के रिश्तों में बाँध दिया। बाप बेटी और माँ बेटे से लेकर दूर-दराज़ के संबंधी तक को विवाह करने से मनाही कर दी गई।

Full list of Degrees of Prohibited Degree of Relationship

पर उन्होंने ऐसा क्यों किया?

उन्होंने ऐसा क्यों किया इसका जवाब उन लोगों के साथ उनकी कब्र में जा चुका है। फ़िर भी हम इतिहास से सत्य की खोज कर सकते हैं।

चलिये, कुछ साल पीछे जाइये और भारतीय परिवारों की संरचना देखिये। आपका क्या दिखता है? सिर्फ़ संयुक्त परिवार। जिन्हें संयुक्त परिवार के बारें में नहीं पता वो जान लें कि संयुक्त परिवार में एक ही व्यक्ति की कई पीढ़ियाँ एक-साथ निवास करती हैं। ऐसे परिवार में सबसे अमीर सबसे ताकतवर होता है और सबसे बूढ़ा सबसे सम्मानित। जब संयुक्त परिवार होते थे तो एक व्यक्ति के सारें बेटे एक ही घर में रहते थे, साथ में रहते थे उनके बच्चे।

भारतीय संस्कृति में हम नियोजित प्रजनन में विश्वास रखते हैं… जरा एक मिनट रुकिये, नहीं ऐसा नहीं है, हम नियंत्रित प्रजनन में विश्वास रखते हैं। नियंत्रित प्रजनन उसी तरह है जैसे बेचने के लिये घोड़ों की होती है। अगर विश्वास न हो तो अखबार का ‘परिणय’ पृष्ठ (Matrimonial Page) निकालिये। जी हाँ, इसी को कहते हैं नियंत्रित प्रजनन। यही वो तरीक़ा जिससे लोग अपने घोड़ों… मेरा मतलब है अपने बच्चों के लिये रात-का-साथी ढूँढ़ते हैं। अगर ये नियोजित प्रजनन होता तो हम 120 करोड़ न हुए होते। हालाँकि, हम 120 करोड़ हैं पर हमारी दशा क्या है? शायद ये सोचने की ज़रूरत है कि आपके पूर्वज अगर मध्यमवर्गी थे तो आप भी मध्यमवर्गी क्यों रह गए?

आज ही की तरह, संयुक्त परिवार में भी बच्चे संख्या में अपने माता-पिता को पछाड़ देते थे। एक जोड़ा रातों-रात सात-सात बच्चों की पूरी टोली बना लेता था।

किसी तरह, ज्यादातर परिजन एक अवधारणा को हर बच्चे के हलक के नीचे उतार देते थे कि जिससे भी वो मिलते हैं वो उनके भाई-बहिन हैं। उन्होंने एक दूसरे को भाई-बहिन कहा, इसमें कोई बुराई नहीं। अच्छा होता अगर बच्चे उसे दिल से मानते (इस तरह देश की जनसंख्या इतनी भयानक न हुई होती, सब भाई-बहिन हुए तो कोई प्रजनन नहीं)। हक़ीक़त में ये बच्चों के माता-पिता के साथ भी हुआ था और दादा-दादी के साथ भी। सबको एक दूसरे का भाई-बहिन बताने की काम किया जाता था। वो एक दूसरे को भाई-बहिन मानते थे भले उनके बीच रक्त संबंध रहा हो या नहीं। यहाँ तक कोई समस्या नहीं थी। समस्या तब शुरु हुई जब माता-पिता ने ये सोचना शुरु कर दिया कि अगर हम किसी रिश्तेदार को भाई-बहिन बोलते हैं तो उसके और हमारे बच्चे भी आपस में भाई-बहिन होंगे।

कालांतर में, जब कज़िन्स (रिश्तेदार) साथ रहते थे तो वो भी यही समझते थे कि वो भाई-बहिन हैं। आज, जब परिवार बिखर चुके हैं और सब दूर-दूर रहने लगे है तो एक सत्य उस अवधारणा पर भारी पड़ गया हैः – “रिश्तेदार भाई बहिन नहीं होते।”

पर यहाँ कहानी ख़त्म नहीं होती। अब सत्य और अवधारणा के बीच में घर्षण होने लगा है। इसी लिये प्रेमी हत्या (जिसे लोग कुटिलतापूर्वक Honor Killing का नाम देते हैं) अस्तित्व में है। लेकिन सिर्फ़ कुछ बताने से समस्या का निवारण नहीं होता। हमें ये सत्य समझना होगा कि चाचा के बच्चे, मामा के बच्चे, फूफा के बच्चे आपस में भाई-बहिन नहीं, वो सिर्फ़ रिश्तेदार हैं।

इसी श्रृंखला का हमारा अगला लेख पढ़ियेः-

Legality of Cousin Marriages and the big friction-Part-3

कज़िन लव और कज़िन मैरिज का वैधानिक पहलू…

कज़िन लव और कज़िन मैरिज पर उठते सवालों का जवाब

कज़िन मैरिज, भले ये अंग्रेजी का शब्द हो पर इसके बारे में हमारे देश का हर व्यक्ति जानता है। हमारे देश में कज़िन को चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई बहिन के नाम से बुलाया जाता है। इस पर भी कुछ वक़्त से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहाँ कज़िन ने आपस में शादी की है या वो शादी करना चाहते हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या जिन्हें सभी भाई-बहिन बताते हैं क्या उन के बीच में शादी होना ठीक हैं?

हमारे देश में शादी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। चाहे हिंदू हो या मुस्लमान, हर किसी को शादी के आगे कुछ दिखाई नहीं देता है। ऐसे में शादी से संबंधित सारे फ़ैसले लेने का जिम्मा सिर्फ़ पिता उठाना चाहता है। भले बाल विवाह की प्रथा को समाप्त मान लिया गया हो पर पिता की मर्जीं पर ही शादी होना बाल विवाह का ही रूप है। ऐसे में कज़िन मैरिज पर बहस ही नहीं होनी चाहिए। परंतु क्योंकि प्रत्येक चीज परिवर्तनशील है इस कारण इसके बारे में जानना अति-आवश्यक है।

देश में कज़िन को भाई-बहिन मानने वालों का यह भी मानना है कि कज़िन मैरिज प्रकृति के विरुद्ध है (हमेशा की तरह आदमी ही तय करने लगा है कि प्रकृति के विरुद्ध क्या है और क्या नहीं)। मनुवादी सभ्यता में जहाँ औरत को घर में कैद करके रखने का अथक प्रयास होता है वहाँ कज़िन मैरिज पर कई तरह के प्रतिबंध लगना सामान्य है। पर हमारे देश में सब कुछ विधि के द्वारा चलता है तो हमें विधि के बारे में भी जान लेना चाहिये। भले समाज की इस विषय में जो भी अवधारण हो पर समाज के पास उसका ख़ुद का कोई दिमाग़ नहीं (तभी तो समाज में तर्कों का कोई स्थान नहीं)।

विधि में शक्ति होती है और विधि में लिखी कोई भी बात किसी सही बात को ग़लत बना सकती है और ग़लत बात को सही भी। आईये जानते हैं कि विधि कज़िन मैरिज के बारे में क्या कहती है।

कज़िन मैरिज पर विधि

अफ़्सोस, विधि कज़िन मैरिज के बारे में कुछ नहीं कहती। यहाँ तक की विधि में कज़िन शब्द का प्रयोग भी नहीं किया गया है। भारतवर्ष में दो वैवाहिक विधियाँ हैं, हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 और विशिष्ट विवाह अधिनियम, 1954। दोनों ही अधिनियम में ऐसे प्रावधान है जिससे कज़िन विवाह पर प्रतिबंध सा लग गया है।

आप में से कुछ बंधु प्रतिबंध का वैधानिक अर्थ शायद न जानते हों। क़ानूनन प्रतिबंध का मतलब है कि आपको कुछ नहीं करना चाहिये। परंतु प्रतिबंध में हमेशा कुछ अपवाद होते हैं। भारत में दहेज प्रथा पर प्रतिबंध है पर 99.9% शादियां दहेज के साथ होती हैं। इसी तरह भारत के विवाह अधिनियमों में  “Prohibited Degree of Relationship” का उपयोग किया गया है।

“Prohibited Degree of Relationship” केवल हिन्दू, सिक्ख, जैन और बुद्ध समुदाय पर ही लागू है। इस “Prohibited Degree of Relationship” के हिसाब से पिता की पाँच पीढ़ियों और माता की तीन पीढ़ियों के बीच में विवाह नहीं होना चाहिये। परंतु अगर सामाजिक रीति और रिवाज़ या पारिवारिक रीति-रिवाज़ कज़िन मैरिज को लेकर सहमत हैं तो कज़िन आपस में शादी कर सकते हैं। इस पर युवा का एक बहुत जायज सवाल है – “समाज या परिवार कौन होते हैं ये तय करने वाले कि हम किस से शादी करें?”

युवा पीढ़ी एक ही वक़्त पर संवेदनशील, ग़ुस्सैल, मूर्ख, समझदार सब होती है। तिस पर भी युवा की एक बात बहुत अच्छी है, वो अपने पूर्वजों की ग़लतियों को दोहराने में विश्वास नहीं रखते न ही उनकी तरह किसी रीति-रिवाज़ को बिना सोच विचार के अपनाते हैं। यहाँ एक ओर युवा को ये पूरा हक है कि वो अपने पसंद के जीवनसाथी के साथ रहें पर वो भी विधि को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते। कम से कम युवा को तो किसी भी तरह के साहसिक कदम को उठाने से पहले विधि को ज़रूर जान लेना चाहिये। जब सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं तब विधि और न्याय ही आख़िरी रास्ता बचता है। विधि के विषय में जागरूकता बहुत ज़रूरी है।

कृपया इस श्रृंखला का हमारा अगला लेख पढ़े:-

कज़िन लव मैरिज पर इतनी आपत्ति क्यों?

संवैधानिकता क्या होती है?

आपने सुना तो होगा ही कि सर्वोच्च न्यायालय धारा 377 की संवैधानिकता जाँच रही है। सवाल ये उठता है कि क्या होती है संवैधानिकता और इससे क्या होगा? आईये, जानते हैं।

संवैधानिकता का अर्थ

संवैधानिकता देश में लागू हर एक विधि और नियम का अंतिम परीक्षण है। किसी विधि या नियम के देश में लागू होने के लिये उसका संवैधानिक होना अतिआवश्यक है। इसी कारण जब भी विधानसभा कोई नई विधि बनाती है तो न्यायालय इस बात का ध्यान रखती है कि विधि संविधान के मुताबिक लागू हो। संविधान के कारण ही पुलिस और सरकार तक विधि को मानने के लिये बंधे होते हैं।

संवैधानिकता से ही किसी विधि के ठीक होने का पता चलता है। परंतु फ़िर भी विधि कई तरीक़ों से ग़लत हो सकती है। जब भी हम समलैंगिक जनों पर धारा 377 के चलते होते अत्याचार की ख़बरें पढ़ते हैं तो ये समझ आता है कि संवैधानिक घोषित विधि में भी खामियाँ हो सकती हैं।
संवैधानिकता के मापदंड क्या हैं?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में लिखा है –

Article 13

ऊपर दिये अनुच्छेद से ही किसी विधि की संवैधानिकता का पता लगाया जा सकता है।

कुछ शब्दों में, जो भी विधि मूल अधिकारों के अनुकूल नहीं है उसे अस्तित्व में नहीं रहना चाहिये।

धारा 377 की प्रकृति विरुद्ध प्रकृति

हम में से कई लोगों ने धारा 377 के विवाद के बारे में तो ज़रूर सुना होगा। देश की सर्वोच्च न्यायालय इसकी संवैधानिकता को जाँचने वाली है। पर आख़िर ये धारा 377 है क्या?

जानें संवैधानिकता क्या होती है?

धारा 377, एक प्रकृति विरुद्ध धारा

धारा 377 या सही शब्दों में भारतीय दण्ड संहिता (ताज़ीरात-ऐ-हिंद) की दफ़ा 377 “प्रकृति विरुद्ध अपराध” के बारें में बात करता है। आप “प्रकृति विरुद्ध” शब्द के कारण भ्रमित हो सकते हैं क्योंकि प्रकृति के विरुद्ध क्या है ये तय करना किसी मनुष्य के बस में नहीं। परंतु भारतीय दण्ड संहिता में इसके बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है। आईये जाने कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा क्या कहती हैः-

धारा 377. प्रकृति विरुद्ध अपराध – जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीवजन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्दियभोग करेगा, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

स्पष्टीकरण – इस धारा में वर्णित अपराध के लिए आवश्यक इन्द्रियभोग गठित करने के लिए प्रवेशन पर्याप्त है।”

भारतीय दण्ड संहिता को पढ़े!!!

धारा 377 का सीधा अर्थ है कि पुरुष द्वारा योनि-मैथुन के अलावा किसी भी अन्य प्रकार का मैथुन प्रकृति विरुद्ध है। इस हास्यपद धारा के मुताबिक देश के लगभग 98% पुरुष/लड़के धारा 377 के अपराधी घोषित हो जाने चाहिये (जिस-जिस का इसमें कभी हाथ रहा हो)।

धारा 377 का विवाद क्या है?

भारत में जो भी आपसी सहमति से हुआ है वह तब तक अपराध है जब तक उस पे समाज की सहमति न हो। समाज सब कुछ नियंत्रण में करना चाहता है और इसी कारण यह विवाद उत्पन्न हुआ है। अपराध होने की स्थिति में सरकार का यह दायित्व है कि वह अपराधी को सज़ा दिलाए। अगर अपराध किसी व्यक्ति द्वारा पंजीकृत किया गया है तो अपराध पीड़ित को न्याय दिलाने के लिये होता है। सामान्य परिस्थितियों में सरकार तभी आपराधिक मुकदमा चलाती है जब किसी व्यक्ति को पीड़ा हुई हो। दुर्भाग्य से धारा 377 समलैंगिक संबंधों की स्थिति में स्वतः ये मान लेती है कि उन्होंने ने प्रकृति विरुद्ध अपराध किया है, अर्थात योनि संभोग के अलावा किसी अन्य तरह का संभोग किया है।

सामान्यतः अगर पीड़ित स्वयं मुकदमा दर्ज कराए तो ही उपचार देना सरकार की जिम्मेदारी है, परंतु धारा 377 में “स्वेच्छया” शब्द के कारण अगर किसी तीसरे व्यक्ति को दो लोगों के समलैंगिक संबंधों से आपत्ति है तो वो भी मुकदमा दर्ज करा सकता है। ऐसी स्थिति में अगर संबंध आपसी सहमति से भी बनाए गए हों तो भारतीय दण्ड संहिता ये सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती कि समलैंगिक जन को दण्ड मिले।

ऐसे अमानवीय और पूर्वनिर्णय से भरी धारा के कारण समलैंगिक जन को समाज के दुष्ट लोगों की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है जिस कारण धारा 377 को ख़त्म करना या उस में फेर बदल करना अति आवश्यक है। धारा 377 की आड़ में लोग अपना हित साधने की कोशिश करते हैं और अपनी दुष्टता पूर्ण योजनाओं के ज़रिये एक समुदाय विशेष को नुकसान पहुँचाते हैं। दो समलैंगिक जनों पर धारा 377 का उपयोग उतना ही घृणित है जितना किसी पुरुष या स्त्री पर झूठा बलात्कार का मुकदमा लगाना। धारा 377 पर सर्वोच्च न्यायालय के संवैधानिकता की जाँच एक स्वागत योग्य पहल है। हो सकता है कि आपको किसी के समलैंगिक संबंधों से कोई परेशानी न हो, पर आपकी इस विषय में निष्क्रियता ऐसे लोगों के षड्यंत्रकारी कुकर्मों को बढ़ावा है जो धर्म और संस्कारों के नाम पर लोगों की ज़िंदगी तबाह करते हैं।

कृपया हमारे अगले लेख को पढ़े।

जानिये क्यों धारा 377 ख़त्म होने लायक है!!!!

श्री शशि थरूर जी की धारा 377 को ख़त्म करने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करें

जानिये क्या है धारा 377 का इतिहास!!!!

धारा 377 के बारे में तो आपने सुना ही होगा पर क्या आप जानते हैं धारा 377 का इतिहास? यही वो धारा है जिसने कुछ वक़्त पहले एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। वह विवाद आज भी अस्तित्व में है। लोग इसके बारे में जाने या नहीं पर बातें सब खूब करते हैं और 377 के सबसे बड़े पीड़ित, LGBT समुदाय के लोगों को गालियाँ भी देने लगते हैं। जानकारी के आभाव में हम अनाप-शनाप बोलते हैं जिससे किसी का भला नहीं होता। तो क्यों न आज हम जानें कि आख़िर क्या है धारा 377 का इतिहास? चलिये जानते है इसके बारें में, इसके इतिहास से।

धारा 377 का इतिहास, इस धारा का जन्म

सालों पहले, जब महारानी विक्टोरिया ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत का साम्राज्य लिया तब, अंग्रेजों के सामने एक भारी समस्या थी। भारत साम्राज्य में तब कोई एक क़ानून नहीं था। इस समस्या को सुलझाने के लिये इंग्लैंड ने सर थामस बेबिंगटन मैकाले को भेजा गया। सर मैकाले ने तब 511 धारा वाली एक लम्बी संहिता बनाई। आज हम उसी 511 धारा वाली संहिता को भारतीय दंड संहिता (ताज़िरात-ए-हिंद) के नाम से जानते हैं। इस संहिता की कुछ धाराऐं जैसे धारा 302, 307, 498-A, 120-B, 420 बहुत प्रसिद्ध हैं। उस संहिता का नाम भले ही कुछ भी रखा गया हो पर ये संहिता पूरी तरह भारतीय नहीं है न ही कभी थी। भारतीय दंड संहिता की आत्मा में अंग्रेजों का क़ानून था जो इंग्लैंड में जन्मा था। तब भी ये संहिता भारत में ख़ूब काम आई।

जब संहिता लिखी जा रही थी तब इंग्लैंड की राजसत्ता पर चर्च हावी था। सन् 1800 की उस सदी में चर्च का मानना था कि संभोग सिर्फ़ बच्चे पैदा करने के लिये होना चाहिये। इस कारण योनि-मैथुन के अतिरिक्त तमाम संभोग अप्राकृतिक घोषित कर दिये गए। जिस चर्च की रूढ़िवादिता के कारण एक भारतीय महिला गर्भपात न होने देने के कारण 21 सदी में मर जाती है, उस चर्च की सन् 1800 में ताकत का अंदाजा अाप साफ़ लगा सकते हैं। जी हाँ, धारा 377 अप्राकृतिक संभोग के बारे में बताती है और उसके लिये दण्ड भी निर्धारित करती है।

धारा 377 की इंग्लैंड में स्थिति

इंग्लैंड की न्याय व्यवस्था न्यायालयों के निर्णयों पर आधारित है। इंग्लैंड के न्याय लिखित संहिताओं पर बहुत कम निर्भर है। साथ ही वहाँ का लिखित न्याय साहित्य भारतीय न्याय साहित्य की तरह विशाल नहीं है। इंग्लैंड में इसी कारण कोई धारा 377 नहीं है। इंग्लैंड के UN Declaration पर हस्ताक्षर करने के बाद वहाँ पर LGBT समुदाय के लोगों के अधिकारों की रक्षा करने की पहल ख़ुद वहीं की सरकार ने की है। यहाँ तक की इंग्लैंड ने Gender Recognition Act,  2004 भी पारित की है जो LGBT समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ किये किसी भी कृत्य के लिये दण्ड निर्धारित करती है। अफ्सोस, भारत में LGBT समुदाय की स्थिति बहुत हद तक बिगड़ चुकी है।

जहाँ धारा 377 के जन्मदाता इंग्लैंड ने इसे कभी अपना क़ानून नहीं बनाया, वहीं भारत में इस क़ानून की आड़ में LGBT समुदाय के लोगों की बलात्कार और हत्या की जा रही है। हमारे देश में जीवन का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को मिला है पर धारा 377 LGBT समुदाय से जीवन का अधिकार ही छीन ले रहा है। समय वाक़ई बहुत बड़ी माँग कर रहा है। परिवर्तन आज नहीं तो कल होना ही है। सारे रूढ़िवादी ख़त्म होंगे और LGBT समुदाय को जीवन का अधिकार मिलेगा। ये हमारे ऊपर है कि हम इसके लिये उनका कितना ख़ून बहने देते हैं।

श्री शशि थरूर जी की धारा 377 को ख़त्म करने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करें

This is years of injustice!!!

Justice, everyone’s right and something nobody has. Whenever we look on our T.V. screens, we find some sad news. Few of them remain inside our mind for few days, maybe few month or a year but then we forget everything. That’s human nature, forgetting. However, recently we have adopted a habit of forgetting things we should not. Injustice is something we shouldn’t forget because when we forget about injustice, history repeats itself.

Forgetting injustice happened makes things to go worse. The habit of we-don’t-wanna-remember-anything isn’t helping anyway. Past and future are lines of the same poem. Whatever our past was, future will shape on the basis of it. We should not forget about something gone wrong in the past so in future it won’t repeat. Ever thought Ramayana with Lanka Dahan stuck in the middle of your marriage ceremony. This could be good for a Christopher Nolan’s movies but not for originality, so, let’s talk about originality on this very day.

As an Indian, we just focus on earning basics, fair enough, but confined it to bread, cloth and shelter is good, what could you say? Old habits, die-hard. In recent time, we start to think about basic human dignity and basic human right as necessities for living, quite good but the nightmarish story of 29 years of delay in justice… or you can say 29 years of injustice, let us think about justice as well. You may think why justice is a necessity for the living but I tell you why should care.

Imagine yourself earning 6 lacs of Rupees every month, living a quite luxurious life with honor. Feeling good? Then you got accused of stealing 4 lacs of your neighbor’s house. Now an accused, condemned and ruined by criminal procedure, you rot in jail, awaiting the court to proceed on your case. You have no way to get out of jail as the court refuse to release you on bail. Confinement of the only bread-winner of the family financially crumbles the family. On every hearing your wife came up with your four-year-old kid, never giving up their hope.

Ironically, you forced to rot in the jail while murderer, rapist, sadists found their way out on bail or parole and even the government let criminal out because they felt jail overcrowded like our country. After few years, your family stopped visiting you in the court and you gave up your hope on 349th hearing. Then court wake up from its long sleep, realizing that as in all 350 hearings no witness has appeared in court. Court calls for records, giving you the benefit of doubt acquits you with honor. What a joke? Even after all the wrongs in your life you thanked god and happily returned where you once lived a happy life. There you find a five-star hotel, illegally built by a politician. You search for your wife and child and find out that your wife was raped by a drunkard and killed while your kid was died out of hunger in his tenth summer. You search for your wife and child and find out that your wife was raped by a drunkard and killed while your kid was died out of hunger in his tenth summer.

Above given incident is imaginary (and it’s now copyrighted), however, there is also a real-life incident who suffered years of injustice in even more horrifying way.

Read about the man who suffered years of injustice