कैसे कज़िन लव और शादी वर्जित बन गई?

क्यों कज़िन मैरिज विवादित है?

कज़िन मैरिज न तो अप्राकृतिक हैं न ही असामाजिक। अगर कज़िन मैरिज के विवादित होने का कुछ कारण है तो वो है माता-पिता की युवा पर अंकुश लगाने की ज़िद। दुनिया के चार प्रमुख धर्मों: ईसाई, इस्लाम, हिंदू और बौद्ध में केवल भारतीय हिंदुओं को ही कज़िन मैरिज के समस्या है। इस पर भी केवल उत्तर भारतीय हिंदुओं की ही ये अवधारण है कि कज़िन भाई-बहिन होते हैं। इन में से ज्यादातर इस मामले में बात नहीं करना चाहते, पर सिर्फ़ आपके बात न करने से किसी समस्या का निवारण संभव नहीं। स्वैच्छिक कज़िन मैरिज पर उत्तर भारतीयों का विरोध और विरोध के लिये ऊलजलूल तर्क हास्यप्रद हैं। इस पर युवा भी अब कज़िन मैरिज पर होने वाले विरोध पर सवाल करने लगा है। कज़िन मैरिज पर होते विरोध के समर्थन में भारतीय हिंदुओं के पास केवल एक ही तर्क है – “Prohibited Degree of Relationship”।

क्या है “Prohibited Degree of Relation”?

भारत देश की विधानसभा का एक बहुत घृणित सत्य है, वो युवा को लेकर उदासीन है और दक़ियानूसी भी। बात 1955 में भी देश की विधान रचनाकार दक़ियानूसी थे। भले ही उन में से कुछ ने देश के लिये जान दी हो, पर वो लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन और पहचान की थी। कहना ग़लत न होगा कि उन्होंने हमें एक गड्ढे से निकाला और गड्ढे पर लगी पट्टी बदल कर वापस उसी गड्ढे में डाल दिया। हमें ग़लत न समझे, हम उन तमाम शहीदों को भी नमन करते हैं जिन्होंने हमें अशिक्षा के अंधकार से निकालने की कोशिश तक नहीं की, पर फ़िर भी हमें उन लोगों से रोष है जिन्होंने उन चीज़ों की सही करने की कभी कोशिश नहीं की जिसे सही करने की सबसे ज्यादा ज़रूरत थी।

कुछ भी हो, जब हिन्दू विवाह अधिनियम बन रहा था तब हमारे देश के कर्णधार विवाह की परिभाषा तय कर देना चाहते थे। ताकि हिन्दू विवाह, मुस्लिम विवाह से, बिल्कुल अलग रहे इसलिये उन्होंने “prohibited degree of relationship” बनाया। इस तरह हमारे आज़ाद देश के कर्ता-धर्ताओं ने देश के सबसे बड़े तबक़े को शादी जैसे संवेदनशील मुद्दे के लिये युवा को समाज और परिजनों का ग़ुलाम बना दिया। उन्होंने हमें तैंतीस प्रकार के रिश्तों में बाँध दिया। बाप बेटी और माँ बेटे से लेकर दूर-दराज़ के संबंधी तक को विवाह करने से मनाही कर दी गई।

Full list of Degrees of Prohibited Degree of Relationship

पर उन्होंने ऐसा क्यों किया?

उन्होंने ऐसा क्यों किया इसका जवाब उन लोगों के साथ उनकी कब्र में जा चुका है। फ़िर भी हम इतिहास से सत्य की खोज कर सकते हैं।

चलिये, कुछ साल पीछे जाइये और भारतीय परिवारों की संरचना देखिये। आपका क्या दिखता है? सिर्फ़ संयुक्त परिवार। जिन्हें संयुक्त परिवार के बारें में नहीं पता वो जान लें कि संयुक्त परिवार में एक ही व्यक्ति की कई पीढ़ियाँ एक-साथ निवास करती हैं। ऐसे परिवार में सबसे अमीर सबसे ताकतवर होता है और सबसे बूढ़ा सबसे सम्मानित। जब संयुक्त परिवार होते थे तो एक व्यक्ति के सारें बेटे एक ही घर में रहते थे, साथ में रहते थे उनके बच्चे।

भारतीय संस्कृति में हम नियोजित प्रजनन में विश्वास रखते हैं… जरा एक मिनट रुकिये, नहीं ऐसा नहीं है, हम नियंत्रित प्रजनन में विश्वास रखते हैं। नियंत्रित प्रजनन उसी तरह है जैसे बेचने के लिये घोड़ों की होती है। अगर विश्वास न हो तो अखबार का ‘परिणय’ पृष्ठ (Matrimonial Page) निकालिये। जी हाँ, इसी को कहते हैं नियंत्रित प्रजनन। यही वो तरीक़ा जिससे लोग अपने घोड़ों… मेरा मतलब है अपने बच्चों के लिये रात-का-साथी ढूँढ़ते हैं। अगर ये नियोजित प्रजनन होता तो हम 120 करोड़ न हुए होते। हालाँकि, हम 120 करोड़ हैं पर हमारी दशा क्या है? शायद ये सोचने की ज़रूरत है कि आपके पूर्वज अगर मध्यमवर्गी थे तो आप भी मध्यमवर्गी क्यों रह गए?

आज ही की तरह, संयुक्त परिवार में भी बच्चे संख्या में अपने माता-पिता को पछाड़ देते थे। एक जोड़ा रातों-रात सात-सात बच्चों की पूरी टोली बना लेता था।

किसी तरह, ज्यादातर परिजन एक अवधारणा को हर बच्चे के हलक के नीचे उतार देते थे कि जिससे भी वो मिलते हैं वो उनके भाई-बहिन हैं। उन्होंने एक दूसरे को भाई-बहिन कहा, इसमें कोई बुराई नहीं। अच्छा होता अगर बच्चे उसे दिल से मानते (इस तरह देश की जनसंख्या इतनी भयानक न हुई होती, सब भाई-बहिन हुए तो कोई प्रजनन नहीं)। हक़ीक़त में ये बच्चों के माता-पिता के साथ भी हुआ था और दादा-दादी के साथ भी। सबको एक दूसरे का भाई-बहिन बताने की काम किया जाता था। वो एक दूसरे को भाई-बहिन मानते थे भले उनके बीच रक्त संबंध रहा हो या नहीं। यहाँ तक कोई समस्या नहीं थी। समस्या तब शुरु हुई जब माता-पिता ने ये सोचना शुरु कर दिया कि अगर हम किसी रिश्तेदार को भाई-बहिन बोलते हैं तो उसके और हमारे बच्चे भी आपस में भाई-बहिन होंगे।

कालांतर में, जब कज़िन्स (रिश्तेदार) साथ रहते थे तो वो भी यही समझते थे कि वो भाई-बहिन हैं। आज, जब परिवार बिखर चुके हैं और सब दूर-दूर रहने लगे है तो एक सत्य उस अवधारणा पर भारी पड़ गया हैः – “रिश्तेदार भाई बहिन नहीं होते।”

पर यहाँ कहानी ख़त्म नहीं होती। अब सत्य और अवधारणा के बीच में घर्षण होने लगा है। इसी लिये प्रेमी हत्या (जिसे लोग कुटिलतापूर्वक Honor Killing का नाम देते हैं) अस्तित्व में है। लेकिन सिर्फ़ कुछ बताने से समस्या का निवारण नहीं होता। हमें ये सत्य समझना होगा कि चाचा के बच्चे, मामा के बच्चे, फूफा के बच्चे आपस में भाई-बहिन नहीं, वो सिर्फ़ रिश्तेदार हैं।

इसी श्रृंखला का हमारा अगला लेख पढ़ियेः-

Legality of Cousin Marriages and the big friction-Part-3

कज़िन लव और कज़िन मैरिज का वैधानिक पहलू…

कज़िन लव और कज़िन मैरिज पर उठते सवालों का जवाब

कज़िन मैरिज, भले ये अंग्रेजी का शब्द हो पर इसके बारे में हमारे देश का हर व्यक्ति जानता है। हमारे देश में कज़िन को चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई बहिन के नाम से बुलाया जाता है। इस पर भी कुछ वक़्त से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जहाँ कज़िन ने आपस में शादी की है या वो शादी करना चाहते हैं। यहाँ सवाल यह उठता है कि क्या जिन्हें सभी भाई-बहिन बताते हैं क्या उन के बीच में शादी होना ठीक हैं?

हमारे देश में शादी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। चाहे हिंदू हो या मुस्लमान, हर किसी को शादी के आगे कुछ दिखाई नहीं देता है। ऐसे में शादी से संबंधित सारे फ़ैसले लेने का जिम्मा सिर्फ़ पिता उठाना चाहता है। भले बाल विवाह की प्रथा को समाप्त मान लिया गया हो पर पिता की मर्जीं पर ही शादी होना बाल विवाह का ही रूप है। ऐसे में कज़िन मैरिज पर बहस ही नहीं होनी चाहिए। परंतु क्योंकि प्रत्येक चीज परिवर्तनशील है इस कारण इसके बारे में जानना अति-आवश्यक है।

देश में कज़िन को भाई-बहिन मानने वालों का यह भी मानना है कि कज़िन मैरिज प्रकृति के विरुद्ध है (हमेशा की तरह आदमी ही तय करने लगा है कि प्रकृति के विरुद्ध क्या है और क्या नहीं)। मनुवादी सभ्यता में जहाँ औरत को घर में कैद करके रखने का अथक प्रयास होता है वहाँ कज़िन मैरिज पर कई तरह के प्रतिबंध लगना सामान्य है। पर हमारे देश में सब कुछ विधि के द्वारा चलता है तो हमें विधि के बारे में भी जान लेना चाहिये। भले समाज की इस विषय में जो भी अवधारण हो पर समाज के पास उसका ख़ुद का कोई दिमाग़ नहीं (तभी तो समाज में तर्कों का कोई स्थान नहीं)।

विधि में शक्ति होती है और विधि में लिखी कोई भी बात किसी सही बात को ग़लत बना सकती है और ग़लत बात को सही भी। आईये जानते हैं कि विधि कज़िन मैरिज के बारे में क्या कहती है।

कज़िन मैरिज पर विधि

अफ़्सोस, विधि कज़िन मैरिज के बारे में कुछ नहीं कहती। यहाँ तक की विधि में कज़िन शब्द का प्रयोग भी नहीं किया गया है। भारतवर्ष में दो वैवाहिक विधियाँ हैं, हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 और विशिष्ट विवाह अधिनियम, 1954। दोनों ही अधिनियम में ऐसे प्रावधान है जिससे कज़िन विवाह पर प्रतिबंध सा लग गया है।

आप में से कुछ बंधु प्रतिबंध का वैधानिक अर्थ शायद न जानते हों। क़ानूनन प्रतिबंध का मतलब है कि आपको कुछ नहीं करना चाहिये। परंतु प्रतिबंध में हमेशा कुछ अपवाद होते हैं। भारत में दहेज प्रथा पर प्रतिबंध है पर 99.9% शादियां दहेज के साथ होती हैं। इसी तरह भारत के विवाह अधिनियमों में  “Prohibited Degree of Relationship” का उपयोग किया गया है।

“Prohibited Degree of Relationship” केवल हिन्दू, सिक्ख, जैन और बुद्ध समुदाय पर ही लागू है। इस “Prohibited Degree of Relationship” के हिसाब से पिता की पाँच पीढ़ियों और माता की तीन पीढ़ियों के बीच में विवाह नहीं होना चाहिये। परंतु अगर सामाजिक रीति और रिवाज़ या पारिवारिक रीति-रिवाज़ कज़िन मैरिज को लेकर सहमत हैं तो कज़िन आपस में शादी कर सकते हैं। इस पर युवा का एक बहुत जायज सवाल है – “समाज या परिवार कौन होते हैं ये तय करने वाले कि हम किस से शादी करें?”

युवा पीढ़ी एक ही वक़्त पर संवेदनशील, ग़ुस्सैल, मूर्ख, समझदार सब होती है। तिस पर भी युवा की एक बात बहुत अच्छी है, वो अपने पूर्वजों की ग़लतियों को दोहराने में विश्वास नहीं रखते न ही उनकी तरह किसी रीति-रिवाज़ को बिना सोच विचार के अपनाते हैं। यहाँ एक ओर युवा को ये पूरा हक है कि वो अपने पसंद के जीवनसाथी के साथ रहें पर वो भी विधि को नज़रंदाज़ नहीं कर सकते। कम से कम युवा को तो किसी भी तरह के साहसिक कदम को उठाने से पहले विधि को ज़रूर जान लेना चाहिये। जब सारे दरवाज़े बंद हो जाते हैं तब विधि और न्याय ही आख़िरी रास्ता बचता है। विधि के विषय में जागरूकता बहुत ज़रूरी है।

कृपया इस श्रृंखला का हमारा अगला लेख पढ़े:-

कज़िन लव मैरिज पर इतनी आपत्ति क्यों?

Why section 377 should be repealed?

Section 377 is the most controversial section of our penal code. A section that has our attraction because the people fought against this Controversial section. But the question is why this section even exists. So let’s take a little history lesson.

How the Section 377 came into existence?

Back in time, when the India was taken by Queen Victoria from the hand of East India Company, there were the troubles faced beforehand. There was no unified law in the Indian sub-continent. To solve this problem, they sent Sir Thomas Babington Macaulay. Sir Macaulay drafted a lengthy draft, containing 511 Sections.

Now, the draft was called Indian Penal Code back in 1860, but it wasn’t Indian in its soul. The sections of Indian Penal Code were based on the law settled in England. Fair enough, they were also effective in India.

Back in then, the church was the prominent preacher of England and its speak was also supported by Crown. The church back then was too much interfering. In the eye of the church, the sex was an activity must be done for procreation. Because of this teaching all carnal intercourse other than the vaginal were hailed as unnatural. You can still see the effect of Churches teaching when you hear an Indian woman died because church refused to allow abortion.

Current status of Section 377 and what’s now in England?

Well, the main source of English Law is the court judgments. There is written law in England but they are not so extensive like Indian. There was no Section 377 in England. However, they signed a UN Declaration that ensure rights or LGBT and now same-sex marriage is legal in there. Even they passed Gender Recognition Act, 2004, which prohibits any hateful act against LGBT. In India, however, the situation has worsened.

Now, Indian people have recognized their right to equality and right to liberty. They accept the things they like and reject what they don’t. The fundamentalist and so-called good people have raped and killed LGBT. While they should be hanged by the neck for such act, they take the support of Section 377.

Sign Mr. Shashi Tharoor’s Petition to remove Section 377 from Indian Penal Code

संवैधानिकता क्या होती है?

आपने सुना तो होगा ही कि सर्वोच्च न्यायालय धारा 377 की संवैधानिकता जाँच रही है। सवाल ये उठता है कि क्या होती है संवैधानिकता और इससे क्या होगा? आईये, जानते हैं।

संवैधानिकता का अर्थ

संवैधानिकता देश में लागू हर एक विधि और नियम का अंतिम परीक्षण है। किसी विधि या नियम के देश में लागू होने के लिये उसका संवैधानिक होना अतिआवश्यक है। इसी कारण जब भी विधानसभा कोई नई विधि बनाती है तो न्यायालय इस बात का ध्यान रखती है कि विधि संविधान के मुताबिक लागू हो। संविधान के कारण ही पुलिस और सरकार तक विधि को मानने के लिये बंधे होते हैं।

संवैधानिकता से ही किसी विधि के ठीक होने का पता चलता है। परंतु फ़िर भी विधि कई तरीक़ों से ग़लत हो सकती है। जब भी हम समलैंगिक जनों पर धारा 377 के चलते होते अत्याचार की ख़बरें पढ़ते हैं तो ये समझ आता है कि संवैधानिक घोषित विधि में भी खामियाँ हो सकती हैं।
संवैधानिकता के मापदंड क्या हैं?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में लिखा है –

Article 13

ऊपर दिये अनुच्छेद से ही किसी विधि की संवैधानिकता का पता लगाया जा सकता है।

कुछ शब्दों में, जो भी विधि मूल अधिकारों के अनुकूल नहीं है उसे अस्तित्व में नहीं रहना चाहिये।

धारा 377 की प्रकृति विरुद्ध प्रकृति

हम में से कई लोगों ने धारा 377 के विवाद के बारे में तो ज़रूर सुना होगा। देश की सर्वोच्च न्यायालय इसकी संवैधानिकता को जाँचने वाली है। पर आख़िर ये धारा 377 है क्या?

जानें संवैधानिकता क्या होती है?

धारा 377, एक प्रकृति विरुद्ध धारा

धारा 377 या सही शब्दों में भारतीय दण्ड संहिता (ताज़ीरात-ऐ-हिंद) की दफ़ा 377 “प्रकृति विरुद्ध अपराध” के बारें में बात करता है। आप “प्रकृति विरुद्ध” शब्द के कारण भ्रमित हो सकते हैं क्योंकि प्रकृति के विरुद्ध क्या है ये तय करना किसी मनुष्य के बस में नहीं। परंतु भारतीय दण्ड संहिता में इसके बारे में बहुत विस्तार से बताया गया है। आईये जाने कि भारतीय दण्ड संहिता की धारा क्या कहती हैः-

धारा 377. प्रकृति विरुद्ध अपराध – जो कोई किसी पुरुष, स्त्री या जीवजन्तु के साथ प्रकृति की व्यवस्था के विरुद्ध स्वेच्छया इन्दियभोग करेगा, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा।

स्पष्टीकरण – इस धारा में वर्णित अपराध के लिए आवश्यक इन्द्रियभोग गठित करने के लिए प्रवेशन पर्याप्त है।”

भारतीय दण्ड संहिता को पढ़े!!!

धारा 377 का सीधा अर्थ है कि पुरुष द्वारा योनि-मैथुन के अलावा किसी भी अन्य प्रकार का मैथुन प्रकृति विरुद्ध है। इस हास्यपद धारा के मुताबिक देश के लगभग 98% पुरुष/लड़के धारा 377 के अपराधी घोषित हो जाने चाहिये (जिस-जिस का इसमें कभी हाथ रहा हो)।

धारा 377 का विवाद क्या है?

भारत में जो भी आपसी सहमति से हुआ है वह तब तक अपराध है जब तक उस पे समाज की सहमति न हो। समाज सब कुछ नियंत्रण में करना चाहता है और इसी कारण यह विवाद उत्पन्न हुआ है। अपराध होने की स्थिति में सरकार का यह दायित्व है कि वह अपराधी को सज़ा दिलाए। अगर अपराध किसी व्यक्ति द्वारा पंजीकृत किया गया है तो अपराध पीड़ित को न्याय दिलाने के लिये होता है। सामान्य परिस्थितियों में सरकार तभी आपराधिक मुकदमा चलाती है जब किसी व्यक्ति को पीड़ा हुई हो। दुर्भाग्य से धारा 377 समलैंगिक संबंधों की स्थिति में स्वतः ये मान लेती है कि उन्होंने ने प्रकृति विरुद्ध अपराध किया है, अर्थात योनि संभोग के अलावा किसी अन्य तरह का संभोग किया है।

सामान्यतः अगर पीड़ित स्वयं मुकदमा दर्ज कराए तो ही उपचार देना सरकार की जिम्मेदारी है, परंतु धारा 377 में “स्वेच्छया” शब्द के कारण अगर किसी तीसरे व्यक्ति को दो लोगों के समलैंगिक संबंधों से आपत्ति है तो वो भी मुकदमा दर्ज करा सकता है। ऐसी स्थिति में अगर संबंध आपसी सहमति से भी बनाए गए हों तो भारतीय दण्ड संहिता ये सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती कि समलैंगिक जन को दण्ड मिले।

ऐसे अमानवीय और पूर्वनिर्णय से भरी धारा के कारण समलैंगिक जन को समाज के दुष्ट लोगों की प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है जिस कारण धारा 377 को ख़त्म करना या उस में फेर बदल करना अति आवश्यक है। धारा 377 की आड़ में लोग अपना हित साधने की कोशिश करते हैं और अपनी दुष्टता पूर्ण योजनाओं के ज़रिये एक समुदाय विशेष को नुकसान पहुँचाते हैं। दो समलैंगिक जनों पर धारा 377 का उपयोग उतना ही घृणित है जितना किसी पुरुष या स्त्री पर झूठा बलात्कार का मुकदमा लगाना। धारा 377 पर सर्वोच्च न्यायालय के संवैधानिकता की जाँच एक स्वागत योग्य पहल है। हो सकता है कि आपको किसी के समलैंगिक संबंधों से कोई परेशानी न हो, पर आपकी इस विषय में निष्क्रियता ऐसे लोगों के षड्यंत्रकारी कुकर्मों को बढ़ावा है जो धर्म और संस्कारों के नाम पर लोगों की ज़िंदगी तबाह करते हैं।

कृपया हमारे अगले लेख को पढ़े।

जानिये क्यों धारा 377 ख़त्म होने लायक है!!!!

श्री शशि थरूर जी की धारा 377 को ख़त्म करने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करें

What is controversial Section 377?

Many of you may have heard that the Supreme Court of India is trying to test the Constitutionality of the controversial Section 377.

What is Constitutionality?

What is Section 377?

The Section 377 or Section 377 of the Indian Penal Code is the law that particularly speaks about the “Unnatural Sex”. You may find the term “Unnatural Sex” confusing because there is no such this in reality. But since the law talks about it so we will do that as well. Let’s have a look what exactly Section 377 of Indian Penal Code says about it:-

377. Unnatural offences: – Whoever voluntarily has carnal intercourse against the order of nature with any man, woman or animal, shall be punished with imprisonment for life, or with imprisonment of either description for a term which may extend to ten years, and shall also be liable to fine.

Explanation- Penetration is sufficient to constitute the carnal intercourse necessary to the offence described in this section.

So you see, the Law has branded an act as “Unnatural”. It must be kept in mind that anything tagged as a punishable offence and can set you inside the jail for a long time.

Know about Indian Penal Code!!!

So what is Controversy about the Section 377?

In India, everything that is consensual and offence is an offence. Society wants to control everything and that’s what made it controversial. It is assumed that Lesbian, Gay, Transgender and Bisexual people are completely sex-oriented people. If you are an LGBT you’ll be assumed to done sex with your partner. Now, because having relationship means consummating and the law says that it must be done with so-called Natural organs, which you cannot, you have done “Unnatural Sex”.

There is a reason behind such the abusive and illogical section inside our Penal Code.

Please Read our next article:-

Why section 377 should be repealed?

What is Constitutionality?

In the news, we hear about the Supreme Court testing Constitutionality of some law. On 2 February, the Supreme Court decided to test the Constitutionality of Section 377 of Indian Penal Code.

What is Constitutionality?

The Constitutionality is the Litmus test of every law and Rule inside the country. For effectiveness, the law must be according to the Constitutional Articles. That’s why the Parliament sets in every time a new law is proposed to make, that’s why the Judiciary watch over the proper implementation of the laws, that’s why Administrative Machinery use power to implement the law.

Constitutionality is the process through which the righteousness of laws is tested. Of course, a law can be wrong in several ways. When we hear news about people killing LGBT or some couple, we think that law is somehow not right.

What is the basis of Constitutionality?

 

Article 13 of the Indian Consitution says: –

Laws inconsistent with or in derogation of the fundamental rights :

(1) All laws in force in the territory of India immediately before the commencement of this Constitution, in so far as they are Inconsistent with the provisions of this Part, shall, to the extent of such inconsistency, be void.
(2) The State shall not make any law which takes away or abridges the rights conferred by this Part and any law made in contravention of this clause shall, to the extent of the contravention, be void.
(3) In this article, unless the context otherwise requires,-
(a) “law” includes any Ordinance, order, bye-law, rule, regulation, notification, custom or usage having in the territory of India the force of law:
(b) “laws in force” includes laws passed or made by a Legislature or other competent authority in the territory of India before the commencement of this Constitution and not previously repealed, notwithstanding that any such law or any part thereof may not be then in operation either at all or in particular areas.
(4) Nothing in this article shall apply to any amendment of this Constitution made under Art.368 .

The above-noted Article is the litmus test of every law.

In short, a law which is not compatible with the Fundamental Rights, must not remain in existence.

जानिये क्या है धारा 377 का इतिहास!!!!

धारा 377 के बारे में तो आपने सुना ही होगा पर क्या आप जानते हैं धारा 377 का इतिहास? यही वो धारा है जिसने कुछ वक़्त पहले एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था। वह विवाद आज भी अस्तित्व में है। लोग इसके बारे में जाने या नहीं पर बातें सब खूब करते हैं और 377 के सबसे बड़े पीड़ित, LGBT समुदाय के लोगों को गालियाँ भी देने लगते हैं। जानकारी के आभाव में हम अनाप-शनाप बोलते हैं जिससे किसी का भला नहीं होता। तो क्यों न आज हम जानें कि आख़िर क्या है धारा 377 का इतिहास? चलिये जानते है इसके बारें में, इसके इतिहास से।

धारा 377 का इतिहास, इस धारा का जन्म

सालों पहले, जब महारानी विक्टोरिया ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से भारत का साम्राज्य लिया तब, अंग्रेजों के सामने एक भारी समस्या थी। भारत साम्राज्य में तब कोई एक क़ानून नहीं था। इस समस्या को सुलझाने के लिये इंग्लैंड ने सर थामस बेबिंगटन मैकाले को भेजा गया। सर मैकाले ने तब 511 धारा वाली एक लम्बी संहिता बनाई। आज हम उसी 511 धारा वाली संहिता को भारतीय दंड संहिता (ताज़िरात-ए-हिंद) के नाम से जानते हैं। इस संहिता की कुछ धाराऐं जैसे धारा 302, 307, 498-A, 120-B, 420 बहुत प्रसिद्ध हैं। उस संहिता का नाम भले ही कुछ भी रखा गया हो पर ये संहिता पूरी तरह भारतीय नहीं है न ही कभी थी। भारतीय दंड संहिता की आत्मा में अंग्रेजों का क़ानून था जो इंग्लैंड में जन्मा था। तब भी ये संहिता भारत में ख़ूब काम आई।

जब संहिता लिखी जा रही थी तब इंग्लैंड की राजसत्ता पर चर्च हावी था। सन् 1800 की उस सदी में चर्च का मानना था कि संभोग सिर्फ़ बच्चे पैदा करने के लिये होना चाहिये। इस कारण योनि-मैथुन के अतिरिक्त तमाम संभोग अप्राकृतिक घोषित कर दिये गए। जिस चर्च की रूढ़िवादिता के कारण एक भारतीय महिला गर्भपात न होने देने के कारण 21 सदी में मर जाती है, उस चर्च की सन् 1800 में ताकत का अंदाजा अाप साफ़ लगा सकते हैं। जी हाँ, धारा 377 अप्राकृतिक संभोग के बारे में बताती है और उसके लिये दण्ड भी निर्धारित करती है।

धारा 377 की इंग्लैंड में स्थिति

इंग्लैंड की न्याय व्यवस्था न्यायालयों के निर्णयों पर आधारित है। इंग्लैंड के न्याय लिखित संहिताओं पर बहुत कम निर्भर है। साथ ही वहाँ का लिखित न्याय साहित्य भारतीय न्याय साहित्य की तरह विशाल नहीं है। इंग्लैंड में इसी कारण कोई धारा 377 नहीं है। इंग्लैंड के UN Declaration पर हस्ताक्षर करने के बाद वहाँ पर LGBT समुदाय के लोगों के अधिकारों की रक्षा करने की पहल ख़ुद वहीं की सरकार ने की है। यहाँ तक की इंग्लैंड ने Gender Recognition Act,  2004 भी पारित की है जो LGBT समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ किये किसी भी कृत्य के लिये दण्ड निर्धारित करती है। अफ्सोस, भारत में LGBT समुदाय की स्थिति बहुत हद तक बिगड़ चुकी है।

जहाँ धारा 377 के जन्मदाता इंग्लैंड ने इसे कभी अपना क़ानून नहीं बनाया, वहीं भारत में इस क़ानून की आड़ में LGBT समुदाय के लोगों की बलात्कार और हत्या की जा रही है। हमारे देश में जीवन का अधिकार प्रत्येक मनुष्य को मिला है पर धारा 377 LGBT समुदाय से जीवन का अधिकार ही छीन ले रहा है। समय वाक़ई बहुत बड़ी माँग कर रहा है। परिवर्तन आज नहीं तो कल होना ही है। सारे रूढ़िवादी ख़त्म होंगे और LGBT समुदाय को जीवन का अधिकार मिलेगा। ये हमारे ऊपर है कि हम इसके लिये उनका कितना ख़ून बहने देते हैं।

श्री शशि थरूर जी की धारा 377 को ख़त्म करने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करें

Legal side of Cousin Love and Cousin Marriage

Is cousin marriage all right? It is a big question in the Indian Society. Are they okay or not is a matter of discussion. Some people (mostly fundamentalist or Manuvadi) claims it as a sin against nature and the god. We are not god (as manager of the gods will say) but we are the god of our own life. In recent times, we have seen so many clandestine and openly discussed a way of living that our society is overwhelmed by it.  However, the society is not law, neither a lawyer, bloody hell society is not a person either. So why should blindly trust and listen to something which has no brain or heart?

kissing-cousins

But we live in a well-structured net of laws. It protects, prohibits some and punish. Whatever we are going to do must be done after looking into the laws. The laws can make it right or awfully wrong. So let’s have a look at the law relating to the cousin marriage.

What Law Says about Cousin Marriage

Alas! Law says nothing about Cousin Love. Even the law doesn’t even used the word cousin in the first place. In India, there are two Marriage Laws, The Hindu Marriage Act, 1955 and Special Marriage Act, 1954. Both laws have virtually made a prohibition on the Cousin Marriage.

Few of you folk might not know what a prohibition is. In law, prohibition means something that should not be done. But there are exceptions. In India Dowry Prohibition Act has been laid down but 99.9% of Indian Marriages are done with Dowry. In the same way, Hindu and Special Marriage Act has laid down a term named “Prohibited Degree of Relationship”.

This Degree of Relationship exists only in Hindu, Sikh, Jain and Buddhist. There is an exception to this Prohibition is the customs of the family, religion, sect or society permits the cousin marriage. Our question is who are they to decide who should marry who?

The Younger generation is sensitive, angry, fool, smart all at the same time, but one thing about the younger generation is better than the last, younger generation cannot tolerate a wrong doing like their ancestors did. Though the Youngsters have their right to choose who they want to spend their life with, they should not ignore the law. At least, the younger generation should understand the law before taking their brave steps. When all the door is closed, the law remains a way to achieve the truth. That why awareness about the law is absolutely necessary. Please continue to the next post:-

Legality of Cousin Marriage and the big friction-Part-2